महंगाई और विकास का झुनझुना

रसोई घर के लिए आग बेहद जरूरी चीज है, लेकिन वह आग यदि माचिस की जगह महंगाई की वजह से सुलगे, तो पूरे देश के जल उठने का खतरा होता है। महंगाई पर 12वीं बार संसद में चर्चा हो रही है, लेकिन सच यह है कि अब तक वह किसी समाधान तक नहीं पहुंची है।

सरकार सांसदों के साथ बहस की सिर्फ रस्मअदायगी करके रह जाती है। ऐसे में पूर्व वित्त मंत्री यशवंत सिन्हा ने जिन बातों की ओर इशारा किया है, उन पर गौर करना चाहिए। हमारे भंडार भरे हों और लोगों को खाद्यान्न न मिल पाए, इससे ज्यादा शर्म की बात और क्या हो सकती है। उनका यह सुझाव काबिलेगौर है कि सरकार अगर 250 लाख टन खाद्यान्न बाजार में उतार दे तो मंहगाई खुद ब खुद कम हो जाएगी। और सरकार की ओर से अनुमानित आठ फीसदी ग्रोथ का मतलब अगर महंगाई का इसी तरह बढ़ते चले जाना है, तो हमें ऐसी ग्रोथ नहीं चाहिए।

सुरसा की तरह मुंह फाड़ती जा रही इस महंगाई के चलते देश के आम आदमी का जीना मुश्किल होता जा रहा है। रोजमर्रा के इस्तेमाल की तमाम चीजें उसकी पकड़ से बाहर हुई जा रही हैं। ऐसे में प्रधानमंत्री के अर्थशास्त्री होने का देश की आम जनता को क्या फायदा? जवाब में यह तर्क दिया जा रहा है कि आज पूरी दुनिया महंगाई के दौर से गुजर रही है। ऐसी बातें सरकार को संतुष्ट कर सकती हैं, लेकिन वे लोगों का पेट नहीं भरतीं। इसलिए सबसे जरूरी है, लोगों की खरीद सीमा में उनकी जरूरत की चीजों का होना। ऐसा अर्थशास्त्र किस काम का जो देश की जनता का दुख ही न समझ सके। लेकिन विडंबना यह है कि सरकार बीमारी की जड़ पहचानने के बदले अपनी तकनीकी मुहावरेबाजी से लोगों को संतुष्ट करना चाहती है। वह बार-बार यह बता रही है कि यहां विकास दर तेज होने से महंगाई बढ़ रही है। महंगाई की रफ्तार रोकने के लिए विकास की रफ्तार कम करनी होगी।

लेकिन वह किस विकास की बात कर रही है। फिलहाल तो वह न इंफ्रास्ट्रक्चर का विकास कर रही है और न प्राडक्टिविटी का। सड़क, रेलवे, बंदरगाह, स्कूल और अस्पताल का निर्माण बहुत धीमी रफ्तार से हो रहा है। नरेगा से इंफ्रास्ट्रक्चर के विकास में कोई लाभ नहीं है। कृषि में कोई बुनियादी बदलाव नहीं आया है। सरकार बार-बार जिस ग्रोथ रेट की बात करती है, वह प्राइवेट सेक्टर की देन है। इस पर ब्रेक लगा कर वह महंगाई कैसे नियंत्रित करेगी? महंगाई की वजह यह है कि उसका गवर्नेंस ठीक नहीं है। सप्लाई चेन पर उसका नियंत्रण नहीं है। यूपीए-2 के सत्ता में आने के बाद से यह लगातार कहा जा रहा है कि सरकार सप्लाई चेन को दुरुस्त करने की कोशिश करे। लेकिन वह आत्म मुग्ध है। आईने में जब वह अपनी सूरत देखती है, तो उसे कुछ शानदार आंकड़े नजर आते हैं। दुर्भाग्य से वे जनता को कतई खुश नहीं करते। और संसद की बहस का संदेश यही है।
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