खत्म करो फ्यूल सरचार्ज

नई दिल्ली, पावर परचेज कॉस्ट (फ्यूल कॉस्ट अडजस्टमेंट मैकेनिजम) के मसले पर दिल्ली इलेक्ट्रिसिटी रेगुलेटरी कमिशन (डीईआरसी) ने जन सुनवाई आयोजित की। इसमें बिजली उपभोक्ताओं ने कहा कि फ्यूल सरचार्ज के नाम पर जेब काटने को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। जन सुनवाई में मौजूद आरडब्लूए प्रतिनिधियों ने कहा कि सिर्फ फ्यूल की कीमत बढ़ने को अलग से नहीं देखा जा सकता। इसके साथ बाकी फैक्टर भी देखने होंगे और वह सारी चीजें भी जिनकी कीमत कम हुई है।

जन सुनवाई में आरडब्लूए प्रतिनिधियों के साथ कई लोग विरोध दर्ज कराने पहुंचे। उन्होंने कहा कि हम इस जन सुनवाई का विरोध कर रहे हैं, क्योंकि हमें तैयारी के लिए पूरा वक्त नहीं दिया गया। 1 जुलाई तक हमें अपनी आपत्तियां देनी थीं, जबकि तब तक बिजली कंपनियों ने हमारे सवालों का जवाब नहीं दिया था। ऐसे में हम किस तरह फैक्ट्स सामने रखते। डीईआरसी चेयरमैन ने उन्हें आश्वासन दिया कि बिजली कंपनियां हर सवाल का जवाब देंगी, जिसके बाद जन सुनवाई शुरू हुई।

डीईआरसी ने पावर परचेज कॉस्ट पर स्टाफ पेपर प्रकाशित किया था। इस पर जनता से राय मांगी गई थी। बिजली कंपनियों की मांग है कि हर तीन या चार महीने में बिजली बिल के साथ फ्यूल सरचार्ज भी जोड़ कर दिया जाए, क्योंकि हमें फ्यूल की कीमत तुरंत अदा करनी पड़ती है।

ग्रेटर कैलाश-1 आरडब्ल्यूए के प्रतिनिधि राजीव काकरिया ने कहा कि बिजली कंपनियां फ्यूल सरचार्ज ऐसे ही नहीं लगा सकतीं। अगर फ्यूल की कीमत बढ़ रही है, तो बहुत सी ऐसी चीजें होंगी, जिनकी कीमत कम हो रही हो। ऐसे में फ्यूल सरचार्ज लेने का क्या मतलब जब किसी चीज की कीमत कम होने पर बिजली बिल कम नहीं होता है। उन्होंने कहा कि प्रोडक्शन कॉस्ट में फ्यूल का कंपोनेंट 5 पर्सेंट से भी कम है। इसके साथ ही दिल्ली को हाइडल पावर (पानी से बनने वाली बिजली) दिलाने की कोशिश क्यों नहीं की जाती। अभी दिल्ली में बिजली की जितनी खपत हो रही है उसका 30 पर्सेंट ही हाइडल पावर है।

एक्टिविस्ट ए. के. दत्ता ने कहा कि फ्यूल में गैस के अलावा कोयला भी है। बिजली कंपनियां अपने अकाउंट में दिखाती हैं कि कोयला 1 टन चला और उन तक 700 किलो पहुंचा। इसका कोई ऑडिट क्यों नहीं होता। कंपनियां किस स्तर का कोयला खरीद रही हैं इसके लिए भी कोई ऑडिट नहीं किया जाता।
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